​कल 20 अगस्त को अनीस भाई का जन्मदिन था। भीड़-भाड़ और दुनियावी शोर से ज़रा हटकर आज इत्मीनान से उन्हें यह पैग़ाम भेज रहा हूँ, क्योंकि जो शख़्सियत अपने आप में एक मिसाल हो, उनकी मुबारकबाद किसी रवायत या तारीख़ की मोहताज़ नहीं होती।

जनपद आजमगढ़ के गाँव 'दौना' की मिट्टी से निकलकर दुबई की बुलंदियों तक अपनी पहचान क़ायम करने वाले हाजी अनीस दौना का नाम हमने बचपन से सुना है, जो रुतबा आज अडानी या अंबानी का माना जाता है। जब हम छोटे-छोटे थे, तब से हमारे ज़िले और शहर में 'अनीस दौना' सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि कामयाबी, वक़ार और बुलंद अफ़कार का दूसरा नाम रहा है।

अनीस भाई का रिश्ता हमारे दिल के बेहद क़रीब है। दुबई बसने से बहुत पहले जब वे ब्रुनेई में थे, तब से हमारे वालिद साहब के कदीम और बेहद अज़ीज़ साथियों में से रहे हैं। वे हमारे दोस्त ज़फ़र के ससुर हैं, दोस्त शादाब के मामू हैं और हमारे बेहद अज़ीज़ आजम भाई के वालिद-ए-मोहतरम हैं।

दुबई और यूएई के सबसे पुराने बाशिंदों में अनीस भाई की गिनती होती है। आज के नए-नए लोग भले ही सड़कों पर कुर्सियाँ लगाकर या चादरें बिछाकर बैठे दिखते हों , लेकिन अनीस भाई की बैठक, उनका वक़ार और उनकी ख़ातिरदारी का अंदाज़ बिल्कुल अलग और बेमिसाल है। उनका अपना एक आभामंडल (aura) और ख़ास रुतबा है, जो किसी खोखले दिखावे का मोहताज़ नहीं।

​उम्र को मात देती बेफ़िक्र ज़िंदादिली

उम्र का बढ़ना एक कुदरती बात है, लेकिन दिल और दिमाग़ पर उम्र का ज़रा भी असर न होने देना अनीस भाई का असली हुनर है। वे आज भी एक 'यंग मैन' की तरह बेफ़िक्र, ज़िंदादिल और ऊर्जा से लबरेज़ हैं। उन्होंने न सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी को बेहद शानदार और बा-इज़्ज़त तरीक़े से जिया, बल्कि अपने बच्चों को बेहतरीन तालीम दी, उनकी आला तरबियत की और उन्हें समाज में एक मक़ाम पर पहुँचाया।

​अल्लाह ताला अनीस भाई को हमेशा सेहत, तंदुरुस्ती, लंबी उम्र और यूँ ही बेफ़िक्र मुस्कुराती हुई ज़िंदगी अता फरमाए।